Class 8th NCERT SCIENCE CHAPTER 1 फसल उत्पादन और प्रबंधन महत्वपूर्ण नोट्स
विज्ञान
अध्याय-1: फसल उत्पादन एवं प्रबंधन
कृषि पद्धतियाँ :- लगभग 10,000 ई.पू पहले हिम युग का अंत हुआ। बढ़ती हुई जनसंख्या को भोजन प्रदान करने के लिए हमें विशिष्ट पद्धति अपनाया होता है।
फसल:- जब एक ही किस्म के पौधे किसी स्थान पर बड़े पैमाने पर उगाए जाते हैं , तो इसे फसल कहते हैं। जैसे – अन्न , सब्जियाँ एवं फल।
फसल के प्रकार:- फसल को दो वर्गों में बँटा जा सकता है।
खरीफ़ फ़सल:- वर्षा ऋतु में लगाये जाने वाले फसलों को खरीफ फसल कहा जाता है। जैसे धान, मक्का, सोयाबीन, कपास आदि खरीफ फसलें हैं। भारत में वर्षा ऋतु सामान्यत: जून से सितम्बर तक होती है। अत: खरीफ के अंतर्गत वे फसलें आती हैं जिन्हें पानी की काफी आवश्यकता होती है।
रबी फ़सल:- वह फसल जिन्हें शीत ऋतु में बोया जाता है। भारत में शीत ऋतु अक्टूबर से मार्च तक होती है। गेंहूँ , चना , मटर , सरसों आदि।
कृषि पद्धतियाँ:- फसल उगाने के लिए किसान को अनेक क्रियाकलाप सामयिक अवधि में करने पड़ते हैं।
1. मिट्टी तैयार करना।
2. बुआई
3. खाद एवं उवर्रक देना
4. सिंचाई
5. खरपतवार से सुरक्षा
6. कटाई
7. भंडारण
1. मिट्टी तैयार करना:- इसमें किसान मिट्टी की जुताई करता है उसमें बहुत सारी कृषि औजारों का इस्तेमाल करता है पहले के समय में हल का इस्तेमाल आमतौर पर
किया जाता था इसमें एक लोहे की सॉफ्ट होती थी। आज के समय में मिट्टी कल्टीवेटर से तैयार की जाती है जो ट्रैक्टर से जुड़ा होता है।
बुआई:- इसमें किसान अच्छे बीजों का चयन करता है। बुवाई में भी किसान हलिया कल्टीवेटर का इस्तेमाल करता है इसकी मदद से बीजों को मिट्टी के अंदर मिला दिया जाता है। इसको आज के समय में सीड ड्रिल के नाम से जाना जाता है।
खाद एवं उवर्रक देना:- ऐसे पदार्थ ने मिट्टी में पोषक स्तर बढ़ाने के लिए मिलाया जाता है उन्हें खाद और उर्वरक कहते हैं। खाद आमतौर पर हमें गोबर, मानव अपशिष्ट और पौधों के अवशेष के विघटन से प्राप्त होता है जबकि उर्वरक फैक्ट्रियों में तैयार किए जाते हैं। उर्वरक से मिट्टी को ह्यूमस नहीं मिलता जबकि खाद से मिट्टी को प्रचुर मात्रा में ह्यूमस मिलता है।
सिंचाई:- किसान पौधों को पानी देने के लिए बहुत सारे स्त्रोतों का इस्तेमाल करता है। इसे हम सिंचाई के नाम से जानते हैं। सिंचाई के मुख्य स्त्रोत कुएं, तालाब, ट्यूबवेल इत्यादि हैं।
सिंचाई की दो आधुनिक विधियां छिड़काव तंत्र और ड्रिप तंत्र है।
ड्रिप तंत्र:- इस विधि में जल बूँद - बूँद करके सीधे ही पौधे की जड़ों में जाता है। अतः इस विधि को ड्रिप तंत्र कहते हैं।
इस प्रकार की विधि का उपयोग फलदार पौधों, बगीचों एवं वृक्षों में किया जाता है। यह सिंचाई की सर्वोत्तम विधि है, जिसमे एक बूँद पानी भी व्यर्थ नहीं होता है।
छिड़काव तंत्र:- असमतल भूमि के लिए ऐसे स्थान पर जहाँ जल की मात्रा कम हो
इस विधि में सीधे पाइपों के ऊपर के सिरों पर घूमने वाले नोज़ल लगे होते है। सभी पाइप एक निश्चित दुरी पर मुख्य पाइप से जुड़े होते है। जब मुख्य पाइप में जल का प्रवाह किया जाता है तो वह छोटे पाइपों से होता हुआ घूमते हुए नोज़ल तक पहुँचता है और बाहर निकल जाता है। ये छिड़काव तंत्र ऐसा लगता है जैसे वर्षा, इस प्रकार का छिड़काव लॉन, कॉफ़ी की खेती के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है
5. खरपतवार से सुरक्षा:- खेत में कुछ फसल के अलावा अवांछित पौधे उग आते हैं जिन्हें हम खरपतवार कहते हैं। खरपतवार हटाने की प्रक्रिया को निराई कहते हैं। हम कुछ रसायनों का प्रयोग भी खरपतवार को नियंत्रित करने में करते हैं जिन्हें खरपतवारनाशी के नाम से जाना जाता है।
खेत में कई अन्य अवांछित पौधों को खरपतवार कहते है। किसान खरपतवार हटाने के लिए कई तरीके अपनाता है, कुछ निम्न हैं-
हाथ से जड़ सहित तोड़कर या फसल उगने से पहले मिट्टी को तैयार करके।
खरपतवार हटाने का सर्वोत्तम समय उनमें पुष्पण एवं बीज बनने से पहले का होता है।
खरपतवार हटाने के लिए खुरपी या हैरो की सहायता ली जाती है।
खरपतवार को रसायनो की सहायता से भी हटाया जाता है, जिनमें 2, 4-D मुख्य खरपतवारनाशी हैं।
खरपतवारनाशी का प्रयोग करते समय मुँह और नाक पर कपड़ा लपेट लेना चाहिए।
निराई:- खरपतवार को हटाने को निराई कहते है।खेतों में निराई करना बहुत आवश्यक है क्योंकि फसल के साथ उगे अवांछित पौधे जल, पोषक, जगह एवं प्रकाश की स्पर्धा कर फसल
की वृद्धि पर हानिकारक प्रभाव डालते हैं। फसल काटते समय भी ये बाधा उत्पन्न करते हैं। कुछ खरपतवार तो विषैले भी होते है, जो मनुष्य और पशुओं के लिए हानिकारक है।
रसायन:- खरपतवार पर नियंत्रण के लिए उपयोग किया जाता है। सायन विज्ञान की वह शाखा है जो भौतिक अवधारणाओं के आधार पर रासायनिक प्रणालियों में घटित होने वाली परिघटनाओं की व्याख्या करती है।
6. कटाई:- जब फसल तैयार हो जाती है तो उसको काटा जाता है जिसे हम कटाई कहते हैं। फसल काटने के लिए हम हार्वेस्टर का इस्तेमाल करते हैं। काटी गई फसल से भूसे और दानों को अलग कर लिया जाता है जिसे थ्रेशिंग के नाम से जाना जाता है।आधुनिक समय में काटने के लिए कंबाइन का इस्तेमाल किया जाता है।
फसलें पककर तैयार, खेतों में गेहूं की कटाई में जुटे किसान
हार्वेस्टर:- हार्वेस्टर मशीन की सहायता से भी फसल की कटाई की जाती है। इसके द्वारा कम समय और मेहनत में कटाई हो जाती है।
थ्रेशिंग:- काटी गई फसल से बीजों/दानों को भूसे से अलग करना, थ्रेशिंग कहलाता है।
थ्रेशिंग का काम कॉम्बाइन मशीन से किया जाता है। कॉम्बाइन मशीन हार्वेस्टर और थ्रेशर का सम्मिलित रूप है।
7. भंडारण:- फसल की प्राप्ति होने के बाद उसे सुरक्षित रख दिया जाता है जिसे हम भंडारण कहते हैं। भंडारण में हमें चूहे और कीटों से फसल की सुरक्षा करनी पड़ती है ताकि उसको खाने के लिए बचाया जा सके।
भंडारण के प्रकार:-
निजी भण्डार:- व्यापारी या विनिर्माता अपने माल के संग्रहण के लिए स्वयं भण्डारगृह रखते हैं और उसका संचालन करते है तो ऐसे भण्डारगृह निजी भण्डारगृह कहलाते हैं।
सार्वजनिक भण्डार:- यह एक स्वतंत्र इकाई होती हैं जिसमें किराया चुका कर कोई भी व्यक्ति अपने माल को इन भण्डार गृहों में रख सकता हैं।
सहकारी भंडारण:- इन भंडारणगृहों की स्थापना सहकारी समितियों द्वारा अपने सदस्यों के लाभ के लिए की जाती है। यह बहुत ही किफायती दर पर भंडारणण सुविधाएं प्रदान करते है।
भंडारण के कार्य:-
भंडारण बड़ी मात्रा में माल को गर्मी, सर्दी, आंधी, नमी से सुरक्षा प्रदान कर हानि को न्यूनतम करते हैं। भंडारण के कार्यो का वर्णन इस प्रकार किया जा सकता है-
वस्तुओं का भंडारणण:- भंडारणगृहों का मुख्य कार्य वस्तुओं को उस समय तक भली-भाँति संग्रहीत करना है जब तक उनके उपयोग, उपभेाग या उनकी बिक्री के लिए आवश्यकता न होगी।
वस्तुओं की सुरक्षा:- भंडारणगृह वस्तुओं को गर्मी धूल, हवा, नमी आदि के कारण खराब होने से बचाते हैं। इनके पास विभिन्न वस्तुओं के लिए उनकी प्रकृति के अनुसार संरक्षण की व्यवस्था होती है।
जोखिम उठाना:- भंडारणगृह में वस्तुओं को हानि अथवा क्षति का जोखिम भंडारणगृह अधिकारी को उठाना होता है। इसीलिए वह उनकी सुरक्षा के सभी उपाय करता है।
मूल्य जमा सेवाएं:- भण्डारगृह में कभी-कभी वस्तुओं का श्रेणीयन का कार्य किया जाता हैं जिससे उसकी पैकिंग व विक्रय में आसानी होती है।
बीजों को पीड़कों एवं सूक्ष्मजीवों से संरक्षित करने के लिए उचित भण्डारण आवश्यक है।
जुताई:- मिट्टी को उलटने-पलटने की प्रक्रिया जुताई कहलाती है। भूमि के उपरी परत को चीरकर, पलटकर या जोतकर उसे बुवाई या पौधा-रोपण के योग्य बनाना जुताई, भू-परिष्करण या कर्षण (tillage) कहलाती है। इस कृषिकार्य में भूमि को कुछ इंचों की गहराई तक खोदकर मिट्टी को पलट दिया जाता है, जिससे नीचे की मिट्टी ऊपर आ जाती है और वायु, पाला, वर्षा और सूर्य के प्रकाश तथा उष्मा आदि प्राकृतिक शक्तियों द्वारा प्रभावित होकर भुरभुरी हो जाती है।
हल:- प्रचीन काल जुताई के लिए हल का प्रयोग किया जाता था। हल एक कृषि यंत्र है जो जमीन की जुताई के काम आता है। इसकी सहायता से बीज बोने के पहले जमीन की आवश्यक तैयारी की जाती है। कृषि में प्रयुक्त औजारों में हल शायद सबसे प्राचीन है और जहाँ तक इतिहास की पहुँच है, हल किसी न किसी रूप में प्रचलित पाया गया है। हल से भूमि की उपरी सतह को उलट दिया जाता है जिससे नये पोषक तत्व उपर आ जाते हैं तथा खर-पतवार एवं फसलों की डंठल आदि जमीन में दब जाती है और धीरे-धीरे खाद में बदल जाते हैं। जुताई करने से जमीन में हवा का प्रवेश भी हो जाता है जिससे जमीन द्वारा पानी (नमी) बनाये रखने की शक्तबढ़ जाती है।
कुदाली:- जिसका उपयोग खरपतवार निकालने के लिए किया जाता है। कुदल , खेतीबारी में उपयोग आने वाला एक उपकरण है। इसकी सहायता से जमीन को खोदा जाता है। यह गड़्ढा खोदने, नाली बनाने, मिट्टी खोदने आदि के काम आती है। इसमें लोहे की बनी एक चौड़ी फाल (ब्लेड) होती है जिसके लम्बवत लकड़ी की बेंट (हत्था) लगा होता है।
कल्टीवेटर:- यह ट्रेक्टर से खींचे जाने वाला लोहे का बना यंत्र होता है, जिसमे कई हल जैसी आकृतियाँ लगी होती है। इसके उपयोग से समय और श्रम दोनों की बचत होती है।
बुआई:- बुआई फसल उत्पादन का सबसे महत्वपूर्ण चरण है।
परम्परागत औज़ार:- ये सिरे मिट्टी को भेदकर बीज को स्थापित कर देते हैं।
सीड-ड्रिल:- आजकल बुआई के लिए द्वारा संचालित सीड-ड्रिल का उपयोग होता है।
खाद एवं उवर्रक मिलाना:- मिट्टी में पोषक स्तर बनाए रखने खाद एवं उवर्रक मिलाया जाता है। कृषि में उपज बढ़ाने के लिए प्रयुक्त रसायन हैं जो पेड - पौधों की वृद्धि में सहायता के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। पानी में शीघ्र घुलने वाले ये रसायन मिट्टी में या पत्तियों पर छिड़काव करके प्रयुक्त किये जाते हैं। पौधे मिट्टी से जड़ों द्वारा एवं ऊपरी छिड़काव करने पर पत्तियों द्वारा उर्वरकों को अवशोषित कर लेते हैं। उर्वरक, पौधों के लिये आवश्यक तत्वों की तत्काल पूर्ति के साधन हैं लेकिन इनके प्रयोग के कुछ दुष्परिणाम भी हैं। ये लंबे समय तक मिट्टी में बने नहीं रहते हैं। सिंचाई के बाद जल के साथ ये रसायन जमीन के नीचे भौम जलस्तर तक पहुँचकर उसे दूषित करते हैं। मिट्टी में उपस्थित जीवाणुओं और सुक्ष्मजीवों के लिए भी ये घातक साबित होते हैं। इसलिए उर्वरक के विकल्प के रूप में जैविक खाद का प्रयोग तेजी से लोकप्रीय हो रहा है। भारत में रासायनिक खाद का सर्वाधिक प्रयोग पंजाब में होता है।इनका उपयोग हमें बहुत कम करना चाहिए।
कम्पोस्टिंग:- रसोई घर के अपशिष्ट सहित पौधों एवं जंतु अपशिष्टों को खाद में परिवर्तित करना कम्पोस्टिंग कहलाता है।
वर्मीकम्पोस्टिंग:- रसोइ घर के कचरे को कृमी अथवा लाल केंचुओं द्वारा कंपोस्ट में परिवर्तित करना वर्मीकम्पोस्टिंग कहलाता हैं।
सिंचाई:- निश्चित अंतराल पर खेत में जल देना।
सिंचाई के स्रोत:- कुऍं , तालाब , नदियाँ , बाँध आदि।
सिंचाई के परंपरागत स्रोत:- सिंचाई जल के कई स्रोत हैं, विभिन्न स्रोतों को निम्न दो वर्गों में बाँटा जा सकता है –
प्राथमिक स्रोत:-
द्वितीयक स्रोत:-
जल के प्राथमिक स्रोत:- प्राकृतिक रूप से जल तीन रुपों
जल
जल वाष्प तथा
बर्फ में पाया जाता है। मूल रूप से जल के स्त्रोत वर्षा व हिमपात हैं। वर्षा व हिमपात से प्राप्त जल की भौतिक स्थिति निरन्तर बदलती रहती है।
जल के द्वितीय स्रोत:- विभिन्न उद्देश्यों के लिये जल प्राप्त करने के मुख्य स्रोत द्वितीयक स्रोत ही हैं।
जलीय चक्र:- के विभिन्न चरणों से गुजरते हुये पानी विभिन्न स्रोतों से प्राप्त होता है।
जल के इन स्रोतों को मोटे तौर पर दो वर्गों में बाँटा जा सकता है,
सतही स्रोत व सतही जल
भूमिगत स्त्रोत व भूमिगत जल
सतही स्रोत व सतही जल:- वर्षा व हिमपात से प्राप्त होने वाले जल का कुछ भाग वाष्पीकृत हो जाता है, कुछ भाग रिस कर नीचे चला जाता है और भूमिगत जल में मिल जाता है तथा शेष बड़ा भाग भूमि सतह के ऊपर रहता है जो सतही जल कहलाता है।
सतही जल के कई स्रोत हैं जिनमें से कुछ मुख्य निम्न हैं-
नदियाँ:-
नदियाँ सतही जल का सबसे बड़ा स्रोत है। वर्षा तथा बर्फ के पिघलने से प्राप्त होने वाला जल पृथ्वी की भौगोलिक स्थिति के अनुसार भू - क्षेत्र के निम्नतम स्तर पर एक धारा के रूप में बहता हुआ बढ़ता है। ऐसी नदियाँ मौसमी कहलाती हैं। इसके विपरीत कछ नदियों में जल वर्ष के हर समय उपलब्ध रहता है, हालांकि जल की मात्रा में पर्याप्त घटत - बढ़त होती रहती है।
तालाब:–
भूमि सतह पर प्राकृतिक अथवा कृत्रिम रूप से बने गडढों तथा निचले स्थानों में वर्षा का जल एकत्रित हो जाता है जिन्हें तालाब कहते हैं।इनमें जल की मात्रा बहत कम होती है। अत :
सिंचाई की दृष्टि से इनका महत्व नगण्य है। इन्हें ग्रामीण क्षेत्रों में केवल पशओं को नहलाने, पानी पिलाने अथवा कपड़े धोने जैसे कार्यों में प्रयोग किया जा सकता है।
झीलें:-
पहाड़ी क्षेत्रों में जहाँ भमि सतह अत्यन्त ऊँची नीची होती है, किन्हीं स्थानों पर तीव्र ढलान होता है तथा वह स्थान चारों ओर से ऊँचे स्थानों से घिरा होता है। ऐसा निचले स्थानो में वर्षा तथा झरनों का पानी एकत्रित हो जाता है जिससे झील का निर्माण हो जाता है। प्रकृति में कई बहुत बड़ी - बड़ी झीलें हैं। कुछ बहुत बड़ी झीलों का निर्माण भूकम्प के कारण जमीन के नीचे धंसने, के कारण भी हुआ है। बड़ी झीलें अपने क्षेत्र में जल आपूर्ति व सिंचाई के लिये एक महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं
भूमिगत पानी को ऊपर लाने की कई विधियाँ हैं जिनमें कुछ प्रमुख निम्न है –
कुऍं:- कूप निर्माण के लिये पृथ्वी सतह से जलग्राही परत तक एक बड़ा छिद्र बनाया जाता है जिसे कुआँ कहते हैं। कुएँ के ऊपर घिरनी लगा कर बाल्टियों से पानी प्राप्त किया जाता है।
नलकूप या ट्यूब वैल:- भूमिगत पानी प्राप्त करने का ये प्रमुख साधन है। और आजकल काफी बड़े पैमाने पर प्रयोग किये जाते हैं। घरेलू प्रयोग के लिये जल आपूर्ति, सिंचाई व औद्योगिक आवश्यकताओं की पूर्ति सभी के लिये नलकूप बहुत प्रचलित हैं। जिन स्थानों पर नहरें नहीं होती हैं, उन स्थानों में नलकूप ही सिंचाई का प्रमुख साधन
है।
पाताल तोड़ कुएँ:- प्रकृति में बहुत से ऐसे स्थान है जहा पाताल तोड़ कुओं के निर्माण की अनुकूल स्थितियाँ हैं।



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